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संधि विच्छेद, संस्कृत में संधि, संस्कृत व्याकरण*

*संधि विच्छेद, संस्कृत में संधि, संस्कृत व्याकरण*

*SANDHI:- Sanskrit Sandhi* 

संस्कृत में संधि विच्छेद दो वर्णों के निकट आने से उनमें जो विकार होता है उसे ‘सन्धि’ कहते है। इस प्रकार की सन्धि के लिए दोनों वर्णो का निकट होना आवश्यक है, क्योकि दूरवर्ती शब्दो या वर्णो में सन्धि नहीं होती है। वर्णो की इस निकट स्थिति को ही सन्धि कहते है। अतः संक्षेप में यह समझना चाहिए कि दो वर्णो के पास-पास आने से उनमें जो परिवर्तन या विकार होता है उसे संस्कृत व्याकरण में सन्धि कहते है। 
उदाहरण -
हिम + आलयः = हिमालयः
रमा + ईशः = रमेंशः
सूर्य + उदयः = सूर्योदयः

संस्कृत संधि के भेद/प्रकार
*संस्कृत भाषा में संधियां तीन प्रकार* की होती है-
●स्वर संधि
●व्यंजन संधि
●विसर्ग संधि

*1. स्वर संधि* - अच् संधि
नियम - दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। 
*उदाहरण-*
हिम+आलय= हिमालय।
रवि + इंद्र = रवींद्र
मुनि + इंद्र = मुनींद्र
नारी + इंदु = नारींदुई
मही + ईश = महीश
भानु + उदय = भानूदय
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व

संस्कृत में *स्वर-संधि आठ प्रकार की होती हैं-*
●दीर्घ संधि - अक: सवर्णे दीर्घ:
●गुण संधि - आद्गुण:
●वृद्धि संधि - ब्रध्दिरेचि
●यण् संधि - इकोऽयणचि
●अयादि संधि - एचोऽयवायाव:
●पूर्वरूप संधि - एडः पदान्तादति
●पररूप संधि - एडि पररूपम्
●प्रकृति भाव संधि - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्

*2. व्यंजन संधि :-* हल् संधि
व्यंजन का स्वर या व्यंजन के साथ मेल होने पर जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते है। उदाहरण-
उत + उल्लास = उल्लास
अप + ज = अब्ज

*व्यंजन संधि (हल् संधि) के प्रकार -*
●श्चुत्व संधि - स्तो श्चुनाश्चु
●ष्टुत्व संधि - स्तो ष्टुनाष्टु
●जश्त्व संधि - झालम् जशोऽन्ते

*3. विसर्ग संधि:-*
विसर्ग का स्वर या व्यंजन के साथ मेल होने पर जो परिवर्तन होता है ,उसे विसर्ग संधि कहते है। *उदाहरण–*
निः + चय = निश्चय
दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
ज्योतिः + चक्र = ज्योतिश्चक्र
निः + छल = निश्छल

*विसर्ग संधि के प्रकार -*
●सत्व संधि
●उत्व् संधि
●रुत्व् संधि
●विसर्ग लोप संधि



*"परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथः!! "-श्री गीता 3‘11!!*

*ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !*
 
*SWAR SANDHI , अच् (स्वर) सन्धिः* Samskritam
By *तोलाराम मीना* April 07, 2019
*अच्न्धि प्रकरणम् :-*
दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

*अच् (स्वर) सन्धिः -*
दो स्वरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं। 

*इसके निम्न प्रकार हैं -*

*1. दीर्घ स्वर सन्धिः -  ‘‘अकः सवर्णे दीर्घः’’ -* अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद में यदि कोई सवर्ण स्वर वर्ण हो तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है। जैसे- 
अ, आ + अ, आ = आ
इ, ई +इ, ई = ई
उ, ऊ + उ, ऊ = ऊ
ऋ, ऋृ + ऋ, ऋृ = ऋृ

*उदाहरण* -  
राम + आलयः = रामालयः (अ+आ)
दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (अ+अ)
विष्णु + उदयः = विष्णूदयः (उ+उ)
श्री + ईशः = श्रीशः (इ+ई)
होतृ + ऋकारः = होतृकारः (ऋ+ऋ) आदि।

*2. गुणस्वर सन्धिः -  ‘‘आद्गुणः’’* - आत् (अवर्ण- अ, आ) से इक् (इ,उ,ऋ,लृ) परे होने पर पूर्व- पर के स्थान पर गुण एकादेश होता है। 

जैसे-  
अ, आ + इ, ई = ए
 अ, आ + उ, ऊ = ओ
 अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  अ, आ + लृ = अल्

नोटः- गुण तीन प्रकार के होते हैं-
*‘‘अदेङ्गुणः’’* -   अर्थात् अत् (अ), एङ् (ए, ओ) का नाम गुण है।
जैसे-
गंगा + उदकम् = गंग् आ + उदकम् = गंग् ओ दकम् = गंगोदकम्
उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (अ + इ = ए)

*3. वृद्धि सन्धिः - ‘‘वृद्धिरेचि’’*-  अवर्ण (अ, आ) से एच् (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि संज्ञक एकादेश होता है। 

*वृद्धि* =  
अ, आ + ए, ऐ = ऐ 
अ, आ + ओ, औ = औ

जैसे :- 
तथा +एव = तथैव
एक + एकम् = एकैकम्
महा +औषधिः = महौषधिः
शर्करा +ओदनः = शर्करौदनः
राज + ऐश्वर्यम् = राजैश्वर्यम्

*4. पररूप सन्धिः -  ‘‘एङिपररूपम्’’* -   अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ हो) उपसर्ग से एङ आदि (जिसके अन्त में ए और ओ हो) धातु के परे होने पर  पर और पूर्व के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।  
जैसे- 
प्र +एजते = प्रेजते
उप + एहि = उपेहि
प्र + ओषति = प्रोषति


*5. पूर्वरूप सन्धिः -   ‘‘एङ्पदान्तादति’’*    - पद के अन्त में यदि एङ् (ए, ओ) हो तो उनके बाद में यदि ह्रस्व अकार है तो पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है। 
ए + अ = ए
ओ + अ = ओ
जैसे - 
हरे + अव = हरेऽव
विष्णो + अव = विष्णोऽव
नमो + अस्तु = नमोऽस्तु
लोके + अस्मिन् = लोकेऽस्मिन्
     
*6. अयादि सन्धिः -  ‘‘एचोऽयवायावः’’*  -  एचः अय् अव् आय् आव् अर्थात् एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के बाद यदि अच् हो तो एच् के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है। 
‘‘यथा संख्यः मनुदेशः समानाम्’’  -  बराबर संख्या वाली विधि क्रम से होती है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्

जैसे-  
भो + अति = भ् ओ + अति = भ् अव् + अति = भवति
करौ + एतौ  = करावेतौ (औ + ए)
गै + अति = गायति(ऐ+अ)
मनो + ए = मनवे

*7. यण् सन्धिः  -  ‘‘इकोयणचि’’*   -  इक् (इ, उ, ऋ, लृ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है यदि ‘अच्’ परे हो तो। 

इ, ई + अच् हो  = य्
उ, ऊ +   अच् हो   = व्
ऋ, ऋृ +  अच् हो   = र्
लृ + अच् हो  = ल्
जैसे -  
यदि + अपि = यद् इ अपि = यद् यपि = यद्यपि
     
 मनु + आदि = मन्वादि
 पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा


*सत्यमेव जयते जयतु भारतम्:* *"परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथः!! "-श्री गीता 3‘11!!*

*ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !*
 
*SWAR SANDHI , अच् (स्वर) सन्धिः* Samskritam
By *तोलाराम मीना* April 07, 2019
*अथ सन्धि प्रकरणम् :-*
दो वर्णों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे सन्धि कहते हैं।

*अच् (स्वर) सन्धिः -*
दो स्वरों के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं। 

*इसके निम्न प्रकार हैं -*

*1. दीर्घ स्वर सन्धिः -  ‘‘अकः सवर्णे दीर्घः’’ -* अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद में यदि कोई सवर्ण स्वर वर्ण हो तो पूर्व और पर दोनों के स्थान पर दीर्घ एकादेश होता है। जैसे- 
अ, आ + अ, आ = आ
इ, ई +इ, ई = ई
उ, ऊ + उ, ऊ = ऊ
ऋ, ऋृ + ऋ, ऋृ = ऋृ

*उदाहरण* -  
राम + आलयः = रामालयः (अ+आ)
दैत्य + अरिः = दैत्यारिः (अ+अ)
विष्णु + उदयः = विष्णूदयः (उ+उ)
श्री + ईशः = श्रीशः (इ+ई)
होतृ + ऋकारः = होतृकारः (ऋ+ऋ) आदि।

*2. गुणस्वर सन्धिः -  ‘‘आद्गुणः’’* - आत् (अवर्ण- अ, आ) से इक् (इ,उ,ऋ,लृ) परे होने पर पूर्व- पर के स्थान पर गुण एकादेश होता है। 

जैसे-  
अ, आ + इ, ई = ए
 अ, आ + उ, ऊ = ओ
 अ, आ + ऋ, ऋृ = अर्
  अ, आ + लृ = अल्

नोटः- गुण तीन प्रकार के होते हैं-
*‘‘अदेङ्गुणः’’* -   अर्थात् अत् (अ), एङ् (ए, ओ) का नाम गुण है।
जैसे-
गंगा + उदकम् = गंग् आ + उदकम् = गंग् ओ दकम् = गंगोदकम्
उप + इन्द्रः = उपेन्द्रः (अ + इ = ए)

*3. वृद्धि सन्धिः - ‘‘वृद्धिरेचि’’*-  अवर्ण (अ, आ) से एच् (ए, ओ, ऐ, औ) परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर वृद्धि संज्ञक एकादेश होता है। 

*वृद्धि* =  
अ, आ + ए, ऐ = ऐ 
अ, आ + ओ, औ = औ

जैसे :- 
तथा +एव = तथैव
एक + एकम् = एकैकम्
महा +औषधिः = महौषधिः
शर्करा +ओदनः = शर्करौदनः
राज + ऐश्वर्यम् = राजैश्वर्यम्

*4. पररूप सन्धिः -  ‘‘एङिपररूपम्’’* -   अवर्णान्त (जिसके अन्त में ‘अ’ हो) उपसर्ग से एङ आदि (जिसके अन्त में ए और ओ हो) धातु के परे होने पर  पर और पूर्व के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।  
जैसे- 
प्र +एजते = प्रेजते
उप + एहि = उपेहि
प्र + ओषति = प्रोषति


*5. पूर्
इ + इ = ई --> रवि + इंद्र = रवींद्र ; मुनि + इंद्र = मुनींद्र
इ + ई = ई --> गिरि + ईश = गिरीश ; मुनि + ईश = मुनीश
ई + इ = ई --> मही + इंद्र = महींद्र ; नारी + इंदु = नारींदु
ई + ई = ई --> नदी + ईश = नदीश ; मही + ईश = महीश .
(ग) उ और ऊ की संधि
उ + उ = ऊ --> भानु + उदय = भानूदय ; विधु + उदय = विधूदय
उ + ऊ = ऊ --> लघु + ऊर्मि = लघूर्मि ; सिधु + ऊर्मि = सिंधूर्मि
ऊ + उ = ऊ --> वधू + उत्सव = वधूत्सव ; वधू + उल्लेख = वधूल्लेख
ऊ + ऊ = ऊ --> भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व ; वधू + ऊर्जा = वधूर्जा

 
(घ) ऋ और ॠ की संधि
ऋ + ऋ = ॠ --> पितृ + ऋणम् = पित्रणम्



*●७. पूर्वरूपसन्धिप्रकरणम्:-* 
*सूत्र:-*  एडः पदान्तादति । 


पूर्वरूप संधि के नियम
नियम - पदांत में अगर "ए" अथवा "ओ" हो और उसके परे 'अकार' हो तो उस अकार का लोप हो जाता है। लोप होने पर अकार का जो चिन्ह रहता है उसे ( ऽ ) 'लुप्ताकार' या 'अवग्रह' कहते हैं।
पूर्वरूप्  संधि के उदाहरन् 

 
ए / ओ + अकार = ऽ --> कवे + अवेहि = कवेऽवेहि
ए / ओ + अकार = ऽ --> प्रभो + अनुग्रहण = प्रभोऽनुग्रहण
ए / ओ + अकार = ऽ --> लोको + अयम् = लोकोSयम् 
ए / ओ + अकार = ऽ --> हरे + अत्र = हरेSत्र

यह संधि आयदि संधि का अपवाद भी होती है।


*●८. प्रकृतिभावसन्धिप्रकरणम्:-* 
*सूत्र:-*  - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्। 

 
प्रकृति भाव संधि के नियम
नियम - ईकारान्त, उकारान्त , और एकारान्त द्विवचन रूप के वाद यदि कोइ स्वर आये तो प्रक्रति भाव हो जाता है। अर्थात् ज्यो का त्यो रहता है ।
*प्रकृति भाव संधि के उदाहरन्*
हरी + एतो = हरी एतो
विष्णू + इमौ = विष्णु इमौ
लते + एते = लते एते
अमी + ईशा = अमी ईशा
फ़ले + अवपतत: = फ़ले अवपतत:

*इति अच्सन्धिप्रकरणम्....*

वरूप सन्धिः -   ‘‘एङ्पदान्तादति’’*    - पद के अन्त में यदि एङ् (ए, ओ) हो तो उनके बाद में यदि ह्रस्व अकार है तो पूर्व और पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है। 
ए + अ = ए
ओ + अ = ओ
जैसे - 
हरे + अव = हरेऽव
विष्णो + अव = विष्णोऽव
नमो + अस्तु = नमोऽस्तु
लोके + अस्मिन् = लोकेऽस्मिन्
     
*6. अयादि सन्धिः -  ‘‘एचोऽयवायावः’’*  -  एचः अय् अव् आय् आव् अर्थात् एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के बाद यदि अच् हो तो एच् के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव् आदेश होता है। 
‘‘यथा संख्यः मनुदेशः समानाम्’’  -  बराबर संख्या वाली विधि क्रम से होती है।
ए = अय्
ओ = अव्
ऐ = आय्
औ = आव्

जैसे-  
भो + अति = भ् ओ + अति = भ् अव् + अति = भवति
करौ + एतौ  = करावेतौ (औ + ए)
गै + अति = गायति(ऐ+अ)
मनो + ए = मनवे

*7. यण् सन्धिः  -  ‘‘इकोयणचि’’*   -  इक् (इ, उ, ऋ, लृ) के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है यदि ‘अच्’ परे हो तो। 

इ, ई + अच् हो  = य्
उ, ऊ +   अच् हो   = व्
ऋ, ऋृ +  अच् हो   = र्
लृ + अच् हो  = ल्
जैसे -  
यदि + अपि = यद् इ अपि = यद् यपि = यद्यपि
     
 मनु + आदि = मन्वादि
 पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

*सत्यमेव जयते जयतु भारतम्...सन्धिप्रकरणम् - संस्कृतव्याकरणम्* 

*सन्धि* शब्द का 
●प्रकृति प्रत्यय - सम्+धा+कि(इ) = सन्धि: । 
●लिङ्ग - पुर्लिंग ।
● *कारण:-* "कि" प्रत्यय द्वारा निर्मित सभी शब्द पुर्लिंग होते हैं। यथा:- सन्धि , विधि , प्रविधि , निधि , व्याधि , उपाधि , समाधि इत्यादि।
*विशेष:-* "कि" प्रत्यय धा धातु में ही लगता है, धा धातु से पूर्व उपसर्ग होना चाहिए।

●परिभाषा:- वर्ण सन्धानं सन्धि: ।
- अर्थ :- दो वर्णों के मेल से उत्पन्न विकार सन्धि कहलाता है।
अर्थात् - 
संस्कृत में संधि विच्छेद दो वर्णों के निकट आने से उनमें जो विकार होता है उसे ‘सन्धि’ कहते है। इस प्रकार की सन्धि के लिए दोनों वर्णो का निकट होना आवश्यक है, क्योकि दूरवर्ती शब्दो या वर्णो में सन्धि नहीं होती है। वर्णो की इस निकट स्थिति को ही सन्धि कहते है। अतः संक्षेप में यह समझना चाहिए कि दो वर्णो के पास-पास आने से उनमें जो परिवर्तन या विकार होता है उसे संस्कृत व्याकरण में सन्धि कहते है।
उदाहरण -
१. हिम + आलयः = हिमालयः
२. रमा + ईशः = रमेंशः
३. सूर्य + उदयः = सूर्योदयः

*●संस्कृत संधि के भेद/प्रकार:-*
 *लघुसिद्धान्तकौमुदी* के अनुसार संस्कृत भाषा में संधियां तीन प्रकार की होती है-
१. स्वर संधि
२. व्यंजन संधि
३. विसर्ग संधि
*किन्तु सिद्धान्तकौमुदी* के अनुसार या व्याकरणशास्त्र की दृष्टि से सन्धि के पाँच भेद माने गए हैं। जो निम्नलिखित हैं :- 
१. स्वरसन्धि (अच्सन्धि)
२. व्यञ्जनसन्धि (हल्सन्धि)
३. विसर्गसन्धि
४. स्वादिसन्धि 
५. प्रकृतिभावसन्धि 

*विशेष:-* 
आचार्य वरदराज  ने लघुसिद्धान्तकौमुदी में स्वादिसन्धि को विसर्ग सन्धि में तथा प्रकृतिभावसन्धि को अचसन्धि के अन्तर्गत ही समावेशित किया है।

*1. स्वर संधि - अच् संधि:-*
●परिभाषा:- 
नियम - दो या दो से अधिक स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। 
उदाहरण-
हिम+आलय= हिमालय।
रवि + इन्द्र = रवीन्द्र:
मुनि + इन्द्र = मुनीन्द्र:
नारी + इन्दु = नारीन्दु
मही + ईश = महीश
भानु + उदय = भानूदय
लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व

*●स्वरसन्धि/अचसन्धि के भेद:-* 
संस्कृत में स्वर-संधि मुख्य रूप से सात भेद होतें हैं। जिनका उचित क्रम सिद्दांतकौमुदी के अनुसार निम्नलिखित है:- 
१. यण् संधि - इकोऽयणचि
२. अयादि संधि - एचोऽयवायाव
३. गुण संधि - आद्गुण:
४. वृद्धि संधि - वृध्दिरेचि
५. पररूप संधि - एडि पररूपम्
६. दीर्घ संधि - अक: सवर्णे दीर्घ:
७. पूर्वरूप संधि - एडः पदान्तादति
*स्वरसन्धि में समावेशित सन्धि:-*
१.प्रकृति भाव संधि - ईदूद्विवचनम् प्रग्रह्यम्


*●१. यणसन्धिप्रकरणम्:-* 
*सूत्र:-*  इकोऽयणचि ।
*पदच्छेद:-* इक: यण् अचि।
*वृति:-* इक: स्थाने यण् स्यात् अचि परे संहितायां विषये।
*अर्थ:-* यदि इक् प्रत्याहार (इ उ ऋ लृ)  बाद कोई आसमान स्वर हो तो इक् के स्थान पर यण् (य् व् र् ल्) आदेश हो जाता है।
*नोट:-*  सन्धि सदैव संहिता के विषय में ही होती है।

 इ/ई   -> य् ।
उ/ऊ   -> व् ।
ऋ/ऋ  -> र् ।
लृ/--   -> ल् ।
*●उदाहरण:-* 
सुधी+उपास्य = सुद्युपास्य / सुद्ध्पास्य ।
मधु + अरि: = मध्वरि: / मद्ध्वरि: ।
धात्रृ + अंश: = धात्रंश: / धात्त्रंश: ।
लृ + आकृति: = लाकृति:।

*नोट:-* प्रथम तीन उदाहरणों में *अनचि च* सूत्र द्वारा विकल्प से द्वित्व हुआ है। 
  
*अन्य उदाहरण:-* 
1. पठतु + अत्र = पतत्वत्र।
2. कुरु + इदम् = कुर्विदम् ।


यण् संधि के चार नियम होते हैं!

*(क) इ, ई के आगे कोई विजातीय (असमान) स्वर होने पर इ ई को ‘य्’ हो जाता है।*
इ + आ = य् --> अति + आचार: = अत्याचार:
इ + अ = य् + अ --> यदि + अपि = यद्यपि
ई + आ = य् + आ --> इति + आदि = इत्यादि।
ई + अ = य् + अ --> नदी + अर्पण = नद्यर्पण
ई + आ = य् + आ --> देवी + आगमन = देव्यागमन

 
*(ख) उ, ऊ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर उ ऊ को ‘व्’ हो जाता है।*
उ + आ = व् --> सु + आगतम् = स्वागतम्
उ + अ = व् + अ --> अनु + अय = अन्वय
उ + आ = व् + आ --> सु + आगत = स्वागत
उ + ए = व् + ए --> अनु + एषण = अन्वेषण

*(ग) ‘ऋ’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘र्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।*
ऋ + अ = र् + आ --> पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

*(घ) ‘ल्र’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘ल्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।*
लृ + आ = ल् --> लृ + आकृति = लाकृति: ।


*●२.अयादिसन्धिप्रकरणम्:-*

*सूत्र:-* - एचोऽयवायाव: । 
*पदच्छेद:-* एच: अय् अव् आय् आव: ।
*वृति:-* एच: क्रमाद् अय् अव् आय् आव् एतै आदेशा: स्यु: अचि। 
*अर्थ:-* यदि एच् प्रत्याहार (ए ओ ऐ औ) के बाद कोई असमान स्वर हो तो इन चारों वर्णों के स्थान पर क्रमशः अय् अव् आय् आव् आदेश हो जाता है।
*उदाहरण:-* 
1. हरे + ए = हरये । (हर्+अय्+ए=हरये)
2. विष्णो + इति =विष्णविति।
3. पौ + अक: = पावकः ।
4. नै + अक: = नायक: । 
5. तौ + एकता = तावेकता।
6. इन्द्रौ + उदिते = इन्द्रावुदिते।

●अयादि संधि का सूत्र *एचोऽयवायाव:* होता है। 
●अयादि संधि के चार नियम होते हैं!

ए, ऐ और ओ औ से परे किसी भी स्वर के होने पर क्रमशः अय्, आय्, अव् और आव् हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।
(क)
ए + अ = अय् + अ --> ने + अन = नयन
(ख)
ऐ + अ = आय् + अ --> गै + अक = गायक
(ग)
ओ + अ = अव् + अ --> पो + अन = पवन
(घ)
औ + अ = आव् + अ --> पौ + अक = पावक
औ + इ = आव् + इ --> नौ + इक = नाविक


*●३.गुणसन्धिप्रकरणम्:-* 
 
*सूत्र:-  आद्गुण:।
*वृति:-* अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेश: स्यात्।
*अर्थ:-* अ या आ के बाद इ/ई ,उ/ऊ , ऋ/ऋ , लृ होतो दोनों के स्थान पर गुण एकादेश: हो जाता है अर्थात् ये दोनों स्वर मिलकर क्रमशः ए, ओ,अर् तथा अल् में बदल जाता है।

गुण संधि के चार नियम होते हैं!
अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए ; उ, ऊ हो तो ओ तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संधि कहते हैं। जैसे -
(क) 
उप+इन्द्र: = उपेन्द्र:।
अ + इ = ए ; नर + इंद्र = नरेंद्र
अ + ई = ए ; नर + ईश= नरेश
आ + इ = ए ; महा + इंद्र = महेंद्र
आ + ई = ए महा + ईश = महेश
(ख) 
अ + उ = ओ ; ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश ;
आ + उ = ओ महा + उत्सव = महोत्सव
अ + ऊ = ओ जल + ऊर्मि = जलोर्मि ;
आ + ऊ = ओ महा + ऊर्मि = महोर्मि।
(ग) 
अ + ऋ = अर् देव + ऋषि = देवर्षि
(घ) 
आ + ऋ = अर् महा + ऋषि = महर्षि


*●४. वृद्धिसन्धिप्रकरणम्:-*
*
*सूत्र:-* वृद्धिरेचि ।
*पदच्छेद:-* वृद्धि: एचि।
*वृत्ति:-* आदेचि परे वृद्धिरेकादेश: स्यात्। गुणापवाद।
*अर्थ:-*  अ या आ के बाद एच् प्रत्याहार का कोई वर्ण हो तो दोनों  के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो जाता है अर्थात् ये दोनों मिलकर क्रमशः ऐ तथा औ में बदल जाते हैं।
(अ/आ+ए/ऐ = ऐ)
(अ/आ+ओ/औ = औ)
*विशेष:-* वृद्धि सन्धि गुणसंधि का अपवाद है क्योंकि गुणसन्धि में सम्पूर्ण अच् परे होने का विधान है जबकि वृद्धिसंधि केवल एच् परे होने पर ही होती है।
1. कृष्ण+एकत्वम् = कृष्णैकत्वम्।
2. देव+ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम्।

वृद्धि संधि के दो नियम होते हैं! 
अ, आ का ए, ऐ से मेल होने पर ऐ तथा अ, आ का ओ, औ से मेल होने पर औ हो जाता है। इसे वृद्धि संधि कहते हैं। जैसे -
(क)
अ + ए = ऐ --> एक + एक = एकैक ;
अ + ऐ = ऐ --> मत + ऐक्य = मतैक्य
आ + ए = ऐ --> सदा + एव = सदैव
आ + ऐ = ऐ --> महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
(ख)
अ + ओ = औ --> वन + औषधि = वनौषधि ;
आ + ओ = औ --> महा + औषधि = महौषधि ;
अ + औ = औ --> परम + औषध = परमौषध ;
आ + औ = औ --> महा + औषध = महौषध


*●५. पररूपसन्धिप्रकरणम्:-*

 *सूत्र:-* - एडि पररूपम्, 
पररूप संधि के नियम
नियम - पदांत में अगर "अ" अथवा "आ" हो और उसके परे 'एकार/ओकार' हो तो उस उपसर्ग के एकार/ओकार का लोप हो जाता है। लोप होने पर अकार/ओकार 'ए/ओ' उपसर्ग में मिल जाता है।
पररूप संधि के उदाहरन्
प्र + एजते = प्रेजते 
उप + एषते = उपेषते 
परा + ओहति = परोहति 
प्र + ओषति = प्रोषति 
उप + एहि = उपेहि

यह संधि वृद्धि संधि का अपवाद भी होती है।


*●६. दीर्घसन्धिप्रकरणम्:-*

 *सूत्र:-*  अक: सवर्णे दीर्घ:। 


दीर्घ संधि के चार नियम होते हैं!
सूत्र-अक: सवर्णे दीर्घ: अर्थात् अक् प्रत्याहार के बाद उसका सवर्ण आये तो दोनो मिलकर दीर्घ बन जाते हैं। ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ के बाद यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ आ जाएँ तो दोनों मिलकर दीर्घ आ, ई और ऊ, ॠ हो जाते हैं। जैसे -

 
(क) अ/आ + अ/आ = आ
अ + अ = आ --> धर्म + अर्थ = धर्मार्थ
अ + आ = आ --> हिम + आलय = हिमालय
अ + आ =आ--> पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
आ + अ = आ --> विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
आ + आ = आ --> विद्या + आलय = विद्यालय
(ख) इ और ई की संधि

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